खेरागढ़ के बाद शमसाबाद में सवर्ण समाज का शक्ति प्रदर्शन, यूजीसी नीतियों और आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा की उठी मांग
आगरा। यूजीसी की नीतियों, आरक्षण व्यवस्था और एससी-एसटी अधिनियम समेत विभिन्न विधिक प्रावधानों की समीक्षा की मांग को लेकर चल रही बहस अब आगरा में भी सड़क पर दिखाई देने लगी है। खेरागढ़ में एक दिन पहले हुए पैदल मार्च के बाद बुधवार को शमसाबाद में सवर्ण समाज के लोगों ने शक्ति प्रदर्शन करते हुए रैली निकाली। बड़ी संख्या में लोग सड़क पर उतरे और अपनी मांगों के समर्थन में आवाज बुलंद की। हालांकि, प्रदर्शन पूरी तरह शांतिपूर्ण रहा और किसी अप्रिय घटना की सूचना नहीं है।
युवराज परिहार के नेतृत्व में बड़ी संख्या में सवर्ण समाज के लोग बाकलपुर स्थित डॉ. बीपीएस डिग्री कॉलेज पर एकत्र हुए। यहां से रैली शुरू हुई, जो एपी इंटर कॉलेज मोड़, महाराणा प्रताप चौराहा होते हुए परशुराम भवन पहुंचकर समाप्त हुई। रैली के दौरान प्रदर्शनकारियों ने महाराणा प्रताप की प्रतिमा पर माल्यार्पण भी किया।
प्रदर्शनकारियों ने यूजीसी की नीतियों, आरक्षण व्यवस्था और एससी-एसटी अधिनियम सहित विभिन्न कानूनी प्रावधानों की समीक्षा किए जाने की मांग उठाई। आयोजकों का कहना है कि उनका उद्देश्य किसी जाति या समुदाय का विरोध करना नहीं, बल्कि समानता, निष्पक्षता और कानून के समान संरक्षण की मांग करना है।
‘किसी जाति के खिलाफ नहीं, समानता की मांग’
प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे युवराज परिहार ने कहा कि आंदोलन का उद्देश्य किसी विशेष जाति या समुदाय को निशाना बनाना नहीं है। उनकी मांग समानता, निष्पक्षता और कानून के समान संरक्षण को लेकर है। आयोजकों के मुताबिक आरक्षण व्यवस्था और अन्य विधिक प्रावधानों की समय-समय पर समीक्षा होनी चाहिए, जिससे किसी भी वर्ग में अन्याय की भावना पैदा न हो और संवैधानिक व्यवस्था में लोगों का विश्वास मजबूत बना रहे।
खेरागढ़ के बाद शमसाबाद में प्रदर्शन से बढ़ी हलचल
खेरागढ़ के बाद शमसाबाद में लगातार दूसरे दिन इस तरह का प्रदर्शन सामने आने से इन मुद्दों को लेकर स्थानीय स्तर पर चर्चा तेज हो गई है। लगातार दो क्षेत्रों में बड़ी संख्या में लोगों का एक ही तरह की मांगों को लेकर सड़क पर उतरना प्रशासन और राजनीतिक दलों के लिए भी महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है।
हालांकि, फिलहाल इन प्रदर्शनों को किसी बड़े राजनीतिक आंदोलन का रूप देना जल्दबाजी होगी। लेकिन यदि आने वाले दिनों में जिले के अन्य ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों में भी इसी तरह के कार्यक्रम आयोजित होते हैं, तो आरक्षण, यूजीसी नीतियों और संबंधित कानूनी प्रावधानों को लेकर स्थानीय राजनीतिक विमर्श और तेज हो सकता है।
चुनावी मुद्दों पर भी पड़ सकता है असर
इन प्रदर्शनों का संभावित राजनीतिक असर आने वाले समय में दिखाई दे सकता है। यदि विभिन्न संगठनों की गतिविधियां लगातार बढ़ती हैं और स्थानीय स्तर पर कोई साझा मंच तैयार होता है, तो संबंधित वर्ग अपने मुद्दों को चुनावी एजेंडे में प्रमुखता से उठाने की कोशिश कर सकता है। वहीं आरक्षण और एससी-एसटी अधिनियम जैसे संवेदनशील विषयों पर राजनीतिक दल भी अपने बयानों और स्थानीय रणनीति को लेकर सतर्क रहेंगे।
दूसरी ओर, यदि प्रदर्शन समानता और नीतिगत समीक्षा की मांग तक सीमित रहते हैं तो इन्हें लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखने के रूप में देखा जाएगा। लेकिन यदि भविष्य में यह मुद्दा जातीय टकराव की भाषा में बदलता है, तो इसका सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव व्यापक हो सकता है। ऐसे में आयोजकों के साथ-साथ प्रशासन की जिम्मेदारी भी बढ़ जाएगी कि प्रदर्शन शांतिपूर्ण और संवैधानिक दायरे में रहें।
पुलिस की सतर्कता से शांतिपूर्ण रहा प्रदर्शन
प्रदर्शन के दौरान आयोजकों और जिम्मेदार लोगों ने लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की। पुलिस की सतर्कता और आयोजकों के सहयोग से रैली शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हुई। किसी अप्रिय घटना की सूचना नहीं है।
प्रदर्शन में युवराज परिहार, राजेश सिंह, हेमंत परिहार, शिशुपाल सिंह धाकरे, जितेंद्र सिकरवार, राजू ठाकुर, विष्णु दत्त शर्मा, हुकम सिंह, नीरू प्रधान, जोगेंद्र सिंह, भानू सिकरवार, शिवा तोमर, पुनीत शर्मा, विशाल शर्मा, चंद्र मोहन शर्मा, दीपक तोमर, एवरन सिंह, सतेन्द्र, मुनेद्र चौहान, भानवेन्द्र, ध्रुव सिकरवार, अभय जादौन, नरेंद्र, भूरा, जसवंत सिंह, वीरेश, मोहित, कन्हैया, धीरज, राजेश, श्रीभगवान, संतोष, देवा, अजय तोमर, लोटन, राहुल शर्मा, आकाश, सोनू पंडित और हरिओम समेत बड़ी संख्या में लोग मौजूद रहे।
फिलहाल आगरा में खेरागढ़ और शमसाबाद में हुए दोनों प्रदर्शन स्थानीय स्तर के कार्यक्रम हैं। इनके आगे किसी बड़े आंदोलन का रूप लेने को लेकर अभी कोई स्पष्ट तस्वीर नहीं है। हालांकि, लगातार दूसरे दिन प्रदर्शन होने से यह जरूर संकेत मिला है कि संबंधित मांगों को लेकर जिले में संगठित लामबंदी की कोशिश शुरू हो गई है।