बाल मजदूरी या मजबूरी ,मजबूरी में मजदूर बना बचपन - समाचार RIGHT

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शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2021

बाल मजदूरी या मजबूरी ,मजबूरी में मजदूर बना बचपन

बाल मजदूरी या मजबूरी ?
 मजबूरी में मजदूर बना बचपन

 किताबो की जगह नन्हे हाथों में औजार

 जनपद आगरा:- बच्चें हमारे देश का भविष्य हैं। बल्कि यूं कहें कि केवल देश ही नहीं दुनिया का भविष्य बच्चे ही हैं।
लेकिन बड़े ही दुर्भाग्य की बात है आज के इस वक्त में ऐसे बहुत से बच्चे हैं जो स्कूल जानें या फिर खेलने की जगह काम करने को मजबूर हैं ताकि दो वक्त की रोटी खा सकें। छोटे बच्चों का इस तरह से जी तोड़ काम करना एक चिंता का विषय बना हुआ है।
स्कूल जानें और खेलने कूदने की उम्र में देश हजारो बच्चे दो वक्त की रोटी के लिए काम करने को मजबूर हैं। 

इस समय पूरा देश वैश्विक महामारी कोरोना की वजह से लगे लॉक डाउन के कारण आर्थिक संकट से गुजर रहे है। जैसा कि सभी जानते है कि लॉक डाउन लगने से सबसे ज़्यादा प्रभावित नीचे तबके के लोग हुए है। जिस कारण बाल श्रमिकों की तदाद भी बढ़ने लगी है।

जहा बाल मजदूरी के खिलाफ आज पूरी दुनिया संघर्ष का संकल्प ले रही है। व कई लोग ऐसे भी है जो पूरी जिंदगी बच्चों के सुनहरे भविष्य के लिए समर्पित हैं।

 बाल मजदूरी देश की तरक्की की नींव गिराने में जिम्मेदार है?
देश में बाल मजदूरी गंभीर समस्याओं में से एक है जो देश के भविष्य और तरक्की की नींव को गिराने के लिए जिम्मेदार है। जहां बचपन खेलने कूदने,पढ़ने और नई-नई चीजों को जानने के लिए होता है। तो वही कुछ बच्चे इसका हक मजबूरीवश खो देते हैं। 

 मां बाप है जिम्मेदार
इसमें गलती बच्चों के परिजनों की भी होती है।जो मजबूरी में मजदूरी करने से मना करने के बजाय उलटा बच्चों को उसी रास्ते में धकेल देते हैं। 

 पेट की भूख व बदहाली ने बना दिया मजदूर 
जमीनी सच्चाई की बात करे तो केंद्र से लेकर राज्य सरकारें बालमजदूरी के कानून के तहत जिला व प्रदेश स्तर पर काफी योजनाओं को लागू तो करती है लेकिन उन योजनाओं को अमलीजामा पहनाने बाले सरकार के नुमाइंदे ही इन गरीब बाल मजदूरों की योजनाओं व पुनर्वास हेतु जो भी सुविधा मिलती है उनको योजनाबद्ध तरीके से डकारते है।
सरकारी नुमाइंदों की उदासीनता का भुगतान बच्चों को मजदूरी कर चुकाना पड़ता है और रही सही कसर  झोपड़ी व झुग्गियों व रोड किनारे डेरे व तंबुओं एवम मलिन बस्तियों में गुजर बसर करने बाले सेकड़ो परिवार में ज्यादातर लोग शराब के आदि है जिससे वह जो भी काम करके पैसा जुटाते है उनकी शराब पीकर अपना शौक पूरा करते है लेकिन उनके बच्चे व बीबी दो वक्त की रोटी की जुगाड़ व छोटे बच्चों के पेट की आग शांत करने के लिए मजबूर होकर अपने नोनिहालो को मजदूरी कराने पर विवश हो जाते है।
यही मुख्य कारण है कि ज्यादातर बच्चे घर की माली हालत व नशेड़ी बाप की वजह से मजदूरी करने पर मजबूर है।
गरीब और बेरोजगार माता-पिता मजबूरी में अपने बच्चों को दलालों के हवाले कर देते हैं. इसके दूसरे पहलू पर विचार करें, तो समझ में आता है कि अगर बाल मजदूरी न कराई जाए, तो ऐसी स्थिति में इन बच्चों के माता-पिता को ही रोजगार मिलेगा. ऐसे में निष्कर्ष यह निकलता है कि अगर बाल मजदूरी पर पूरी तरह से रोक लगा दी जाए, तो ज्यादातर बेरोजगार वयस्कों को रोजगार मिल सकता है.
 *सुशासन पर प्रश्नचिन्ह लगती बालमजदूरी* 
बढ़ता हुआ बाल श्रम और बाल भिक्षा विकसित समाज और सुशासन पर प्रश्न चिन्ह लग रहा है। जहां एक ओर सरकार ने व्यवस्था के दर्जनों विभाग खोल रखे हैं। उन विभागों में असहाय और बाल श्रमिक उनके लिये जबाब देह विभाग नही ढूंढ पा रहे हैं। सरकार इन बच्चों के लिए अधिकारों की घोषणा तो करती है लेकिन जिम्मेदार अफसर इन्हें योजनाओं का लाभ ही नहीं दिला पाते हैं।

 जून में बालमजदूरी दिवस मनाने तक ही सीमित प्रशासन

केंद्र सरकार के लाख दावों के बावजूद देश में बाल मजदूरी बढ़ रही है। हर साल सरकार को बाल मजदूरी की जून में ही याद आती है। बहुत से ऐसे सरकारी कार्यालय भी हैं, जहां आज भी चाय लेकर बाल मजदूर ही पहुंचते हैं। पर इसके खिलाफ न कोई आवाज उठाता है और दूसरों को अवेयर करता है। हालांकि देश में बाल मजदूर रखने पर जुर्माने व कैद का प्रावधान भी है लेकिन दुकानों, ढाबों व चाय के खोखों पर बच्चे मजदूरी करते देखे जा सकते हैं। अधिकतर बच्चे पारिवारिक मजबूरी के कारण ही बाल मजदूरी करने को विवश हैं। इसलिए उनका कहना है कि सरकार को पहले भरपेट खाना दिलाना चाहिए फिर  यह बाल मजदूरी खत्म की जा सकेगी।


 जिला प्रशासन नहीं करता कार्यवाही
सरकार और न्यायालय ने बाल श्रम रोकने के लिए कानून तो बना दिए। मगर कठोरता से इनका पालन नहीं होने से शहर में कई स्थानों पर बच्चे काम करते दिखाई देते हैँ। वहीं अब तक पुलिस और प्रशासन ने इस पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की है। कार्रवाई नहीं होने के कारण लोगों में सजा का डर भी नहीं है। होटलों, ढाबों सहित बड़े व्यापारिक स्थलों पर भी 14 वर्ष से कम के बच्चों से बाल श्रम करवाया जा रहा है।

होटल, मिस्त्री, चाय की दुकानों पर कर रहे काम
शहर के छोटे-बड़े होटलों में टेबल साफ करने से लेकर प्लेट धोने तक का ये काम करते हैँ। कई बार इनसे मारपीट की भी जाती है लेकिन ये मजबूरी के कारण कहीं शिकायत तक नहीं कर पाते हैं। इसके अलावा दोपहिया वाहनों के रिपेयरिंग सेंटर में इनसे कठोर श्रम भी कराया जाता है। इसके बाद इन्हें 20 रुपए से लेकर 100 रुपए तक की मजदूरी दी जाती है। इसके बदले में इनसे 10 से 12 घंटे काम कराया जाता है। 

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