पश्चिम एशिया तनाव व ऊर्जा संकट के समय भारतीय जनमानस की जिम्मेदारी-— के. के. भारद्वाज
आगरा:-आज पूरी दुनिया ऊर्जा संकट और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के दौर से गुजर रही है। ऐसे समय में भारत जैसे विकासशील देश के लिए ऊर्जा सुरक्षा केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का राष्ट्रीय कर्तव्य बन जाती है। जब देश अपनी 80 प्रतिशत से अधिक पेट्रोलियम आवश्यकताओं के लिए आयात पर निर्भर हो, तब ईंधन की हर बूंद राष्ट्रीय संपत्ति का रूप ले लेती है।
ऊर्जा संरक्षण आज केवल व्यक्तिगत बचत का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रहित से जुड़ा हुआ मुद्दा है। यदि आम नागरिक छोटी-छोटी आदतों में बदलाव लाएँ, तो देश पर पड़ने वाला आर्थिक बोझ काफी हद तक कम किया जा सकता है। कार पूलिंग, सार्वजनिक परिवहन, साइकिल और पैदल चलने जैसी आदतें न केवल ईंधन बचाती हैं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इसी प्रकार घरों में बिजली का संयमित उपयोग, LED बल्बों और ऊर्जा दक्ष उपकरणों का प्रयोग तथा LPG की बचत सीधे तौर पर विदेशी मुद्रा बचाने में सहायक होती है।
संकट के समय अफवाहें समाज और अर्थव्यवस्था दोनों के लिए घातक साबित होती हैं। पेट्रोल-डीजल का अनावश्यक भंडारण या सोशल मीडिया पर भ्रम फैलाने वाली खबरों को बढ़ावा देना कृत्रिम संकट पैदा कर सकता है। इसलिए नागरिकों को संयम, धैर्य और जागरूकता का परिचय देना चाहिए तथा केवल सरकारी और विश्वसनीय स्रोतों पर भरोसा करना चाहिए।
वर्तमान परिस्थितियों में वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों को अपनाना भी समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बन चुका है। इलेक्ट्रिक वाहन, CNG, सोलर रूफटॉप और स्वदेशी उत्पादों का अधिक से अधिक उपयोग भारत को ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ा सकता है। साथ ही खाड़ी देशों में कार्यरत भारतीयों और उनके परिवारों के प्रति संवेदनशीलता तथा सरकार द्वारा जारी एडवाइजरी का पालन भी राष्ट्रीय जिम्मेदारी का हिस्सा है।
यदि ऊर्जा संरक्षण को हम केवल अभियान नहीं, बल्कि संस्कार बना लें, तो आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित और आत्मनिर्भर भारत मिल सकेगा। एक लीटर ईंधन की बचत केवल धन की बचत नहीं करती, बल्कि देश की आर्थिक मजबूती और राष्ट्रीय सुरक्षा को भी सुदृढ़ बनाती है। यही सच्चे अर्थों में राष्ट्रभक्ति और जिम्मेदार नागरिकता का परिचायक है।