जनपद आगरा में गौशालाओं को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में अभिनव पहल
निराश्रित गौ आश्रय स्थलों में नवाचार, स्वयं सहायता समूह बना रहे वर्मी कम्पोस्ट, अगरबत्ती, धूपबत्ती और उपले
गौशालाओं को आत्मनिर्भर बनाने के साथ ग्रामीण महिलाओं की आजीविका को मिल रहा नया आयाम
जनपद आगरा में संचालित निराश्रित गौ आश्रय स्थलों को आत्मनिर्भर बनाने एवं स्वयं सहायता समूहों (SHG) की आजीविका संवर्धन के उद्देश्य से विभिन्न नवाचारात्मक गतिविधियों का संचालन किया जा रहा है। गौशालाओं में उपलब्ध गोबर का उपयोग कर वर्मी कम्पोस्ट, उपले, गोबर के लट्ठे, अगरबत्ती एवं धूपबत्ती जैसे उत्पादों का निर्माण कर महिला स्वयं सहायता समूहों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने का प्रयास किया जा रहा है।
जनपद की विभिन्न विकास खंडों की गौशालाओं से स्वयं सहायता समूहों को जोड़ा गया है, जहां वर्मी कम्पोस्ट निर्माण हेतु समूहों का चयन किया गया है तथा कई स्थानों पर उत्पादन कार्य प्रारंभ हो चुका है। अछनेरा के गोबरा गौशाला में आरआरसी केंद्र के माध्यम से वर्मी कम्पोस्ट का निर्माण किया जा रहा है, वहीं एत्मादपुर के कलवारी क्षेत्र में भगवती स्वयं सहायता समूह द्वारा वर्मी कम्पोस्ट का उत्पादन एवं विक्रय किया जा रहा है।
खंदौली विकास खंड के धोरऊ गौशाला में प्रयास ग्रामीण रोजगार संस्थान के सहयोग से 10 स्वयं सहायता समूहों के 50 सदस्यों द्वारा गोबर से अगरबत्ती, धूपबत्ती एवं मच्छर अगरबत्ती का निर्माण किया जा रहा है, जो ग्रामीण महिलाओं के लिए आय का नया स्रोत बन रहा है।
जैतपुर कलां, खेरागढ़, फतेहपुर सीकरी, जगनेर, पिनाहट, सैयां , बिचपुरी एवं अन्य विकास खंडों में भी स्वयं सहायता समूहों द्वारा गोबर से उपले एवं लट्ठे बनाने का कार्य किया जा रहा है। कई स्थानों पर वर्मी कम्पोस्ट इकाइयों की स्थापना की प्रक्रिया प्रगति पर है तथा समूहों को आवश्यक प्रशिक्षण एवं तकनीकी सहयोग उपलब्ध कराया जा रहा है।
इस पहल का मुख्य उद्देश्य गौशालाओं में उपलब्ध संसाधनों का प्रभावी उपयोग कर जैविक उत्पादों को बढ़ावा देना, पर्यावरण संरक्षण सुनिश्चित करना तथा ग्रामीण महिलाओं को सतत आजीविका के अवसर प्रदान करना है। इससे एक ओर गौशालाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता बढ़ेगी, वहीं दूसरी ओर जैविक खेती को भी प्रोत्साहन मिलेगा।
जनपद प्रशासन एवं संबंधित विभागों द्वारा इन गतिविधियों की नियमित निगरानी की जा रही है, ताकि निर्धारित लक्ष्यों की समयबद्ध पूर्ति सुनिश्चित की जा सके। आने वाले समय में इस मॉडल को और अधिक गौशालाओं में विस्तारित करने की योजना है, जिससे अधिकाधिक स्वयं सहायता समूह लाभान्वित हो सकें।
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