"सिर्फ एक बंदा काफी है" जैसी फिल्मे बनाना बहुत ही साहस का काम : सावन चौहान
आगरा। फ़िल्म "सिर्फ एक बंदा काफी है"
सच्ची घटना पर आधारित हैं। आरोपी क़ो ताउम्र सलाखों के पीछे पहुंचाने बाले असली हीरो के बारे में लोग बहुत कम जानते होंगे लेकिन हम बात कर रहें हैं। साहसी हाईकोर्ट के वकील पीसी सोलंकी की, जिन्होंने तमाम दिक्कतों झेलते हुये पोक्सो एक्ट के तहत पीड़ित नाबालिग लड़की का असाधारण केस लड़ा और पीड़िता को इंसाफ दिलवाया।
फिल्मों के जानकर व सॉर्ट फ़िल्म निर्माता सावन चौहान ने सिर्फ एक बंदा काफी है फ़िल्म के निर्माता, निर्देशक व फ़िल्म की टीम और हाईकोर्ट के वकील पीसी सोलंकी के साहसी रॉल कि तारीफ करते हुये मीडिया रिपोट्स के मुताबिक बताया कि सिर्फ एक बंदा काफी है जैसी फिल्मे बनाना बहुत ही साहस का काम हैं। इस फ़िल्म में मनोज वाजपई ने एडवोकेट पीसी सोलंकी के किरदार को जिस तरह जिया वो वाकई वकील की तरह लगे मनोज एक्टर के तौर पर नही। यह फ़िल्म 23 मई को जी 5 पर आ रही है। यह फ़िल्म हाईकोर्ट के वकील पीसी सोलंकी के ऊपर आधारित है। इस फिल्म में ये साहसी वकील कैसे देश के नामी 30 वकीलों को मात दे कर अभियुक्त को सजा दिलवाते है। वहीं, केस लड़ने के दौरान पीसी सोलंकी को और उनके परिवार को जान से मारने की धमकियां मिलीं, उनके खिलाफ कोर्ट में पर्चे बांटे गए। केस के गवाह को कोर्ट परिसर के अंदर ही चाकू घोंप दिया गया। उन पर काफी दबाव बनाया गया, लेकिन वो पीड़िता को इंसाफ दिलाने के लिए बिना डरे लड़ते रहे। आरोपी के समर्थक उनके रिश्तेदारों के जरिए खरीदने का प्रयास करने लगे। ऐसी बातें सुनकर उनके पिता ने कहा केस हाथ में ले चुके हो, पूरा लड़ना, बकालत पर कोई दाग नहीं लगना चाहिए। घर में बूढ़े माता-पिता और पांच साल का बेटा था। बेटे को स्कूल के लिए तैयार करने, पहुंचाने, पैरेंट्स मीटिंग भी अटेंड करनी होती थी। ऐसे में स्कूल की टीचर ने उनसे कहा कि आप अपने बेटे की चिंता छोड़ दें, उसके लिए हम हैं। आप सिर्फ उस बेटी काे न्याय दिलाइए। इस बात से उनकी रातों की नींद चली गई, वे अचानक आंख खुलते और किताबों से साइटेशन व नए कानूनों को डायरी पर लिखना शुरू कर देता थे। इसके चलते पीसी सोलंकी ने हर बार आरोपी के वकील को शिकस्त दी और जिरह पूरी होने में तकरीबन तीन साल लग गए। उनके आगे आरोपी का हर दांव फेल हो गया। जमानत के लिए आरोपी ने देश के बड़े से बड़े वकील को हायर किया लेकिन जमानत नहीं मिल सकी।
मीडिया रिपोट्स के मुताबिक एडवोकेट पीसी सोलंकी जब इस लड़की का केस अपने हाथ में लेते है तो एक किस्सा सुनाते है उस लड़की के मां बाप को, वो किस्सा बड़ा दिलचस्प है। वकालत क्या है ? वकालत का दूसरा नाम दलील ही तो है, जिसके पास दलील है, तर्क है, वही कामयाब वकील है। लोगों का कहना हैं कि वकालत कोई भी पास कर सकता है, पर ये कोई जरूरी नहीं कि वो वकील अच्छा बन जाए। अच्छे वकील के पास बहुत अच्छी तर्क शक्ति होनी चाहिए। यहां तो कुछ वकीलों को अपना केस तैयार करना तक नहीं आता, लड़ना तो दूर की बात हैं। कागजी कारवाही में ही वो अपना अनाड़ी पन दिखला जाते है क्युकी वो काबिल गुरुओं से सीखना ही नहीं चाहते लेकिन अधिवक्ता का रॉल बहुत ही दमदार दिखाया गया हैं। देश के सबसे बड़े वकील अपनी दलील के आगे टिकने नहीं दिया। उन्होंने सिर्फ एक दलील देकर डिफेंड करने का मौका तक नहीं दिया और आरोपी के बकीलों की दलील को काट कर रख दिया। एक गुमनाम वकील देश के नामी गिरामी वकीलों को मात दी और आरोपी कि जमानत नहीं होने दी। इसी कारण वे पांच साल डर और खौफ में जीते रहें। इसी केस में चार चार गवाहो की हत्या भी हो जाती है। सुरक्षा के नाम पर इस वकील को सिर्फ एक गार्ड मिलता है, फिर भी ये अपने होंसले को गिरने नही देते हैं। वो अदालत में कहते है कि इस लड़की को दुनिया ने या तो एक पीड़िता के रूप में देखा या किसी ने इसे वासना के रूप में देखा लेकिन मुझे इसके अंदर एक रौद्र मां काली और दुर्गा का रूप दिखा जो इस आरोपी के खिलाफ लड़ना चाहती है। जिसने मुझे इस केस को लड़ने का हौंसला दिया। आज आरोपी रेप केस में सलाखों के पीछे है। केस की सुनवाई के दौरान मिली धमकियों के चलते लंबे समय तक परिजनों को भी पुलिस सुरक्षा में रहना पड़ा। जब आरोपी को सजा के एलान के बाद पीसी सोलंकी पीड़िता के घर पहुंचे तो उनकी मां ने उन्हें आशीर्वाद के रूप में 100 रुपए भी दिए थे। इस गुमनाम रहे सच्चे वकील ने बिना डरे बड़े बड़े बकीलों को मात दी और न्याय हित में पीड़ित क़ो पूरा न्याय दिलाया।