राष्ट्र प्रथम : एक संकल्प, एक संस्कार— के.के. भारद्वाज, चिंतक एवं विचारक - समाचार RIGHT

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शनिवार, 30 मई 2026

राष्ट्र प्रथम : एक संकल्प, एक संस्कार— के.के. भारद्वाज, चिंतक एवं विचारक

राष्ट्र प्रथम : एक संकल्प, एक संस्कार

— के.के. भारद्वाज, चिंतक एवं विचारक

“राष्ट्र प्रथम” केवल एक नारा नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक के जीवन का मूल मंत्र और संस्कार होना चाहिए। जब व्यक्ति अपने निजी हितों से ऊपर उठकर राष्ट्रहित को सर्वोच्च स्थान देता है, तभी एक सशक्त, आत्मनिर्भर और विकसित राष्ट्र का निर्माण संभव होता है। सच्ची देशभक्ति केवल शब्दों, नारों या अवसर विशेष पर व्यक्त किए गए भावों तक सीमित नहीं होती, बल्कि हमारे दैनिक आचरण, जिम्मेदारियों और कर्तव्यों के निर्वहन में दिखाई देती है।

देश की सीमाओं पर तैनात सैनिक अपने प्राणों की परवाह किए बिना राष्ट्र की सुरक्षा करता है। किसान कठिन परिस्थितियों में परिश्रम कर अन्न उत्पादन करता है। शिक्षक नई पीढ़ी को ज्ञान, संस्कार और नैतिक मूल्यों से समृद्ध करता है, जबकि वैज्ञानिक अपने शोध और नवाचारों के माध्यम से भारत को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने का कार्य करते हैं। इसी प्रकार एक कर्मचारी का ईमानदारी से अपने दायित्वों का निर्वहन करना, समय का सम्मान करना, करों का नियमित भुगतान करना और सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना भी राष्ट्रसेवा का ही एक महत्वपूर्ण रूप है।

वर्तमान समय में पूरा विश्व ऊर्जा संकट, जलवायु परिवर्तन, आर्थिक चुनौतियों और सामाजिक अस्थिरता जैसी समस्याओं से जूझ रहा है। ऐसे में भारत को आत्मनिर्भर, समृद्ध और शक्तिशाली बनाने की जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं, बल्कि देश के प्रत्येक नागरिक की भी है। बिजली और पानी की बचत, स्वदेशी उत्पादों को प्रोत्साहन, पर्यावरण संरक्षण, स्वच्छता के प्रति जागरूकता तथा समाज में सकारात्मक सोच का प्रसार भले ही छोटे प्रयास प्रतीत हों, लेकिन यही छोटे-छोटे कदम राष्ट्र निर्माण की मजबूत नींव बनते हैं।

“राष्ट्र प्रथम” किसी राजनीतिक दल, जाति, धर्म या विचारधारा का विषय नहीं है। यह एक ऐसी राष्ट्रीय चेतना है, जो हमें यह प्रेरणा देती है कि हमारा हर निर्णय, हर प्रयास और हर कार्य देश के सम्मान, एकता और विकास को मजबूत करने वाला हो। यदि भारत के 140 करोड़ नागरिक प्रतिदिन राष्ट्रहित में एक सकारात्मक कार्य करने का संकल्प लें, तो देश को विश्व के अग्रणी राष्ट्रों में स्थापित होने से कोई नहीं रोक सकता।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अधिकारों के साथ-साथ अपने कर्तव्यों के प्रति भी सजग रहें। राष्ट्र के प्रति समर्पण, अनुशासन, ईमानदारी और जिम्मेदारी की भावना ही विकसित भारत की आधारशिला है।

आइए, हम सभी यह संकल्प लें—

“मेरा हर कदम, राष्ट्र प्रथम; मेरा हर कर्म, राष्ट्र के नाम।”

— के.के. भारद्वाज
चिंतक एवं विचारक

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